तुलसी-हल्दी से बिल्कुल ठीक हो जाता है कैंसर, कई लोग अब तक हो चुके हैं ठीक-खर्च मात्र 2 हजार रु

New Delhi :  गुटखा और तंबाकू से होने वाले मुख कैंसर को रोकने के लिए अब देसी इलाज की राह निकल आई है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में दंत विान संकाय के डीन प्रो. टीपी चतुर्वेदी ने शोध के बाद पाया कि तुलसी और हल्दी से मुंह में होने वाले इस जटिल रोग का सटीक इलाज संभव है।

यूं तो हम हल्दी और तुलसी के प्राकृतिक गुणों से पहले से ही परिचित हैं, अब इन दोनों की इसी विशिष्टता का उपयोग ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस डिसीज जो आगे चलकर मुख कैंसर बन जाता है, के इलाज हेतु भी किया जा सकेगा।

करीब एक वर्ष तक चले प्रो. चतुर्वेदी की टीम के शोध को डेंटल कौंसिल ऑफ इंडिया पहले ही मान्यता प्रदान कर चुकी है। मार्च 2013 में बीएचयू ने भी चिकित्सकों की देखरेख में इस पद्धति से उपचार करने की अनुमति प्रदान कर दी। सर सुंदरलाल अस्पताल में हल्दी और तुलसी के संयोग से बनी औषधि से उपचार हो भी रहा है। मुख रोग के इलाज में तुलसी और हल्दी का अपने आप में यह पहला प्रयोग है।

कैसे होता है इलाज- प्रो. टीपी चतुर्वेदी बताते हैं कि उनकी टीम द्वारा हल्दी और तुलसी की सूखी पलियों को पीसकर पाउडर बनाया जाता है। पाउडर को ग्लिसरीन में मिलाकर मुंह की मासपेशियों पर लगाया जाता है। प्रो. चतुर्वेदी के सहयोगी असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अदित बताते हैं कि पीड़ित व्यक्ति को इलाज के पूर्व गुटखा छोड़ना पड़ता है।

रोग के लक्षण- गुटखा खाने से मुंह खोलने वाली मासपेशियों का लचीलापन समाप्त हो जाता है और वो कड़ी हो जाती हैं। मुंह का खुलना धीरे-धीरे कम हो जाता है और मुंह से लेकर गले तक जलन होने लगती है। जीभ के घूमने की गति भी धीमी हो जाती है। स्वाद लेने की क्षमता कम हो जाती है। लापरवाही बरतने पर यही आगे चलकर मुख कैंसर में बदल सकता है। यह धीरे-धीरे गले को भी जकड़ लेता है। प्रो. चतुर्वेदी के अनुसार भारतीय युवाओं को यह रोग सर्वाधिक होता है क्योंकि युवा ही सर्वाधिक गुटखा खाते हैं।

तुलसी और हल्दी ही क्यों :

डॉ. अदित बताते हैं कि वैसे तो तुलसी और हल्दी में कुदरती आयुर्वेदिक गुण होते ही हैं मगर इसमें कैंसर रोकने वाले महत्वपूर्ण एंटी इंफ्लेमेटरी तत्व भी होते हैं। तुलसी इस रोग में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा देती है। घाव भरने में भी तुलसी मददगार होती है अत: आसानी से सुलभ दोनों आयुर्वेदिक औषधियों का सहारा लिया गया। प्रो. टीपी चतुर्वेदी बताते हैं कि अभी तक ओएसएमएफ रोग के लिए तुलसी और हल्दी का प्रयोग नहीं किया गया था। प्रतिदिन आठ दस पीड़ित: सर सुंदरलाल चिकित्सालय के दंत विभाग की ओपीडी में आठ से दस ओएसएमएफ रोगी प्रतिदिन आ रहे हैं। करीब 25 रोगियों का उपचार चल रहा है। सस्ता इलाज इसके इलाज में बहुत कम खर्च आता है। प्रो. चतुर्वेदी बताते हैं कि ओएसएमएफ रोग के प्रारंभिक चरण में इलाज शुरू हो जाए तो दो हजार रुपये में पीड़ित पूरी तरह स्वस्थ हो जाएगा।

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