The Untold Story of Exit Poll : पढिए कब, कहां, क्यों और कैसे शुरू हुए एग्जिट पोल

New Delhi : देश में चुनाव चल रहे हैं। आज सातवां चरण हैं। सातवें चरण के लिए सुबह 6 से वोटिंग हो रही है। 8 राज्यों की 59 सीटों पर वोटिंग चल रही है। आज ही एग्जिट पोल भी आने हैं। जी हां वही एग्जिट पोल जिसका आप बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

अब क्या है कि कई लोगों को तो पता होता है कि एग्जिट पोल क्या है क्यों है। ऐसे में जिनको नहीं पता उनके लिए हम लाए हैं The Untold Story of Exit Poll। इस स्टोरी में हम आपको एग्जिट पोल का ABCD सब बताएंगे।

पहले सिर्फ चुनावों नहीं, हर मसले पर होता था एग्जिट पोल : 

आज भले ही एग्जिट पोल (Exit Poll) चुनावों में राजनीतिक दलों की हार-जीत तक सीमित से लगते हैं लेकिन शुरू में ऐसा नहीं था। शुरुआत में एग्जिट पोल वो औजार बना जिससे पत्रकार विभिन्न मसलों पर जनता की राय जानने के लिए एग्जिट पोल का इस्तेमाल करते थे।

सबसे पहले श्रेय जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने शुरू किए: 

ये जो आज दुनिया भर में एग्जिट पोल चल रहे हैं इनको शुरू करने का श्रेय जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन को जाता है। दोनों पत्रकार थे। वो भी अमेरिका जैसे देश के। एक बार दोनों का मन किया कि चलो सरकार के कामकाज पर अमेरिकी की जनता की राय लेते हैं। बस फिर क्या था दोनों ने गली गली घूमकर कर दिया एग्जिट पोल। जब पोल हुआ तो वो बिल्कुल सही साबित हुआ। जनता ने जो बताया वही रिजल्ट भी आया। दोनों को पता लग गया कि एग्जिट पोल काम के हैं, जनता पूछने पर झूठ नहीं बोलती। बस फिर क्या था एग्जिट पोल और वो दोनों पत्रकार दुनिया भर में फेसम हो गए।

अमेरिका के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने अपनाया :

अब जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने जो शुरूआत की वो सबसे पहले ब्रिटेन और फ्रांस पहुंची। ब्रिटेन और फ्रांस ने पहली बार 1937 और 1938 में एग्जिट पोल को अपनाया था। उस समय हुए चुनाव के नतीजे बिलकुल सटीक निकले।

नीदरलैंड के समाजशास्त्री मार्सेल वॉन को मत भूलो भाई :

वैसे जॉर्ज गैलप और क्लॉड रोबिंसन ने बीज बोया लेकिन पौधा बड़ा किया नीदरलैंड के समाजशास्त्री मार्सेल वॉन ने। मार्सेल वॉन ने 15 फरवरी, 1967 को पहली बार एग्जिट पोल का इस्तेमाल डच विधानसभा चुनाव में किया। मार्सेल राजनीति में भी थे, लेकिन जब पोल का चस्का चढ़ा तो राजनीति छोड़ जनता की नब्ज टटोलने का काम करने लगे। नीदरलैंड में हुए चुनाव में उनका आकलन सटीक बैठा था।

भारत में कब आए एग्जिट पोल :

साल था 1960 जब भारत में एग्जिट पोल का आगमन हुआ। 80 के दशक के मध्य में उस वक्त चार्टर्ड अकाउंटेंट से पत्रकार बने प्रणय रॉय ने मतदाताओं की नब्ज टटोलने की कोशिश की थी। यहीं से भारत में एग्जिट पोल शुरू हुए, ऐसा माना जाता है। शुरुआती दौर में जो भी एग्जिट पोल होते थे वे इंडिया टुडे मैगजीन में प्रमुखता से छपते थे। यह सिलसिला अब भी जारी है।

1996 के चुनावों से फेमस हो गए एग्जिट पोल :

1996 के लोकसभा चुनावों में एग्जिट पोल फेमस हो गए। दरअसल 1996 में CSDS को दूरदर्शन ने देशभर में एग्जिट पोल करने की अनुमति दे दी। इस एग्जिट पोल में किसी भी दल को बहुमत मिलता नहीं दिखा। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन बहुमत हासिल नहीं कर पाई थी। नतीजा ये रहा कि महज 13 दिन में अटल सरकार गिर गई। इसके बाद एचडी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल ने मिलकर UPA की सरकार बनाई। इसके बाद 1998 के लोकसभा चुनाव में हुए एग्जिट पोल ज्यादातर समाचार चैनलों में प्रकाशित हुए। इस चुनाव में चार बड़ी चुनावी सर्वे करने वाली एजेंसियां जैसे India Today/CSDS, DRS, Outlook/AC Nielsen और Frontline/CMS अपने सर्वे में नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (NDA) को बड़ी पार्टी रूप में दर्शाया था, लेकिन बहुमत दूर रखा था।

और एक दिन एग्जिट पोल के खिलाफ हो गई सारी पार्टिंया :
1999 में चुनाव आयोग ने बाकायदा एक एक्जीक्यूटिव ऑर्डर के तहत ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल को बैन कर दिया। वजह थी सभी राजनीति दलों की आंख में एग्जिट पोल का खटकना। इसके एक समाचार पत्र ने आयोग के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी थी। कोर्ट ने इस आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि आयोग के पास ऐसे ऑर्डर जारी करने की शक्ति नहीं है और किसी मसले पर सर्वदलीय सर्वसम्मति उसके खिलाफ कानूनी प्रतिबंध का आधार नहीं होती है।

2009 में हुए फेरबदल :

2009 लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर एग्जिट पोल को बैन करने की मांग उठी। जिस पर चुनाव आयोग ने कानून मंत्रालय को प्रतिबंध के संदर्भ में कानून में बदलाव के लिए तुरंत एक अध्यादेश लाए जाने संबंधी पत्र लिखा। 2009 में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन किया। संशोधित कानून के अनुसार चुनावी प्रक्रिया के दौरान जब तक अंतिम वोट नहीं पड़ जाता, एग्जिट पोल नहीं दिखाए जा सकते हैं। इस कानून के अनुसार किसी भी माध्यम से कोई भी पोल के नतीजों को न तो दिखा सकता है और न ही प्रकाशित कर सकता है।