दुश्मन को उसके घर में घुसकर मारते हैं पैरा कमांडो..इन्होंने ही दिया था सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम

New Delhi : PAK में घुसकर आतंकवादी शिविरों को तबाह करने वाले भारत के पैरा कमांडो कम ही सुर्खियों में रहते हैं। यह शायद बहुत ही कम लोग जानते हैं कि उन्हें बहुत ही कठिन प्रशिक्षण के दौर से गुजरना पड़ता है। अपने ध्येय वाक्य ‘बलिदान’ को अपने कंधे पर सजाकर चलने वाले ये कमांडो विषम से विषम परिस्थितियों में भी अपने मिशन को अंजाम देते हैं। अर्थात असंभव को संभव बनाना इनकी आदत में शुमार है।

पैरा स्पेशल फोर्स (एसएफ) बनने के लिए चयन सेना की विभिन्न रेजिमेंट्स में से ही होता है। इसमें अधिकारी, जवान, जेसीओ सहित विभिन्न रैंकों से सैनिक चुने जाते हैं। इनका अनुपात 10 हजार में से एक का होता है अर्थात पैरा एसएफ बनने के लिए 10 हजार में से एक सैनिक का चयन होता है। पैरा स्पेशल फोर्स बनने के लिए आवेदन ऐच्छिक होता है या कमान अधिकारी इसकी अनुशंसा करता है।

…और फिर शुरू होता है कठिनतम प्रशिक्षण : इनकी पहचान इनके सिर पर लगी महरून बैरेट (गोल टोपी) और ध्येय वाक्य ‘बलिदान’ से होती है। इसे हासिल करने के लिए बेहद मुश्किल प्रशिक्षण को पूरा करना होता है। इस कोर्स को पूरा करने वालों की औसत आयु 22 वर्ष है।

90 दिनों के इस प्रशिक्षण को दुनिया के सबसे मुश्किल प्रशिक्षणों में से माना जाता है और इसमें भाग लेने वाले कुछ ही सैनिक इसे सफलतापूर्वक पूरा कर पाते हैं। इस प्रशिक्षण में मानसिक, शारीरिक क्षमता और इच्छाशक्ति का जबरदस्त इम्तिहान लिया जाता है। इस प्रशिक्षण के दौरान दिनभर में पीठ पर 30 किलो सामान जिसमें हथियार व अन्य जरूरी साजो-सामान लाद कर 30 से 40 किमी की दौड़, तरह-तरह के हथियारों को चलाना और बमों-बारूदी सुरंगों का प्रयोग आदि सिखाया जाता है।

इस प्रशिक्षण में सबसे मुश्किल होते हैं 36 घंटे जिसमें बिना सोए, खाए-पीए एक मिशन को अंजाम देना होता है। इस मिशन में सैनिक की हर तरह से परीक्षा ली जाती है। असली गोलियों और बमों के धमाकों के बीच उन्हें दिए गए मिशन को अंजाम देना होता है। यदि कोई सैनिक सोता या खाता-पीता पकड़ा जाता है तो उसे या तो तत्काल निकाल दिया जाता है या पूरा कोर्स फिर से करवाया जाता है। इन 36 घंटों के दौरान उन्हें दुश्मन पर हमला करना, दुश्मन के हमले का सामना करना और किसी बंधक को छुड़वाने जैसे खतरनाक कामों को अंजाम देना पड़ता है।