दूसरे के पैसे से कभी अपना भला नहीं होता.. अपनी मेहनत से कमाए पैसे ही अपना भला होता है

New Delhi  : किसी शहर में एक सेठ रहते थे, उनकी एक ही बेटी थी। सेठ ने अपनी बेटी का विवाह भी पैसे वाले घर में किया, लेकिन बेटी के भाग्य में सुख न होने के कारण उसका पति जुआरी बन गया और अपनी पूरी धन-संपत्ति उसी में गंवा बैठा।

बेटी की ऐसी हालत देखकर सेठानी रोज सेठ से कहती कि आप दुनिया की मदद करते हो, मगर अपनी बेटी परेशानी में होते हुए उसकी मदद क्यों नहीं करते हो? सेठ हमेशा एक ही बात कहते- उसी पैसे से उनका भाग्य उदय होगा, जो वो खुद कमाएंगे, हमारे देने से उनका भला नहीं होगा।

एक दिन सेठ घर पर नहीं थे, तभी उनका दामाद घर आ गया। सास ने दामाद का आदर-सत्कार किया और बेटी की मदद करने के विचार से दामाद को जो लड्‌डू को टोकरी दी, उसमें सोने की अशर्फियां रख दी। सोचा कि जब दामाद घर जाकर लड्‌डू खाएंगे तो उन्हें अशर्फियां मिल जाएंगी।

दामाद लड्‌डू लेकर घर से चला तो बीच रास्ते में उसे विचार आया कि इतना वजन लेकर घर तक कौन जाएगा? ये सोचकर दामाद ने मिठाई की दुकान पर वो लड्‌डू को टोकरी बेच दी। जब सेठ शाम को घर जा रहे थे तो उनकी इच्छा मिठाई खाने को हुई।  किस्मत से सेठ भी उसी दुकान पर गए, जहां उनके दामाद ने लड्‌डू की टोकरी बेची थी। संयोग से वही टोकरी सेठ ने खरीद ली और लेकर घर पहुंच गए। जब सेठानी ने वो टोकरी देखी तो उनका माथा ठनका। सेठानी को उसमें सोने की अशर्फियां भी मिल गईं।
सेठ ने बताया कि ये टोकरी तो उन्होंने मिठाई की दुकान से खरीदी है। सेठ-सेठानी को पूरी बात समझते देर न लगी। सेठ ने सेठानी से कहा कि- ये अशर्फियां दामाद की मेहनत से कमाई हुई नहीं थी, लेकिन उसे नहीं मिल सकी। बरकत हमेशा अपनी मेहनत से कमाए धन में ही होती है।

सीख : कई लोग दूसरों के धन पर नजर रखते हैं, लेकिन वे ये नहीं जानते तो दूसरों के पैसे उनके पास आ भी जाएंगे तो बरकत नहीं होगी क्योंकि ये उनकी मेहनत की कमाई नहीं है। इसलिए हमेशा अपनी मेहनत से कमाए धन से ही संतुष्ट होना चाहिए, दूसरों का धन देखकर ललचाना नहीं चाहिए।