शिव का अवतार हैं काल भैरव..इनकी पूजा करने से दूर होता है हर तरह का डर

New Delhi : हिंदू धर्म के अनेक शास्त्रों में भगवान भैरव की महिमा मिलती है। भैरव जहां शिव के गण के रूप में जाने जाते है वही वह दुर्गा के पुजारी माने गए है। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं। इनकी आराधना का समय भी मध्य-रात्रि के समय 12 से 3 का माना जाता है।

शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव के 2 स्वरूप बताए गए हैं। एक स्वरूप में महादेव अपने भक्तों को अभ्य देने वाले विस्वय स्वरूप है और दूसरे स्वरूप में भगवान शिव दुष्टों को दंड देने वाले काल भैरव स्वरूप में वित्तमान हैं। शिवजी का विश्वेश स्वरूप अत्यंत ही सौम्य और शांत है। ये भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है। वहीं भैरव स्वरूप रौद्र रूप वाले है। इनका रूप भयानक और विकराल होता है। इनकी पूजा करने वाले भक्तो को किसी भी प्रकार का डर कभी परेशान नहीं करता। कलयुग में भय से बचने के लिए Kaal Bhairav की आराधना सबसे अच्छा उपाय माना जाता है। काल भैरव को शिवजी का ही रूप माना गया है।

काल भैरव की पूजा करने वाले व्यक्ति को किसी भी प्रकार का डर नहीं सताता है। भैरव शब्द का अर्थ ही होता है भीषण, भयानक या डरावना। भैरव को शिव के द्वारा उत्पन्न हुआ या शिव पुत्र माना जाता है। भगवान शिव के 8 विभिन्न रूपों में से भैरव एक है वो भगवान शिव का एक प्रमुख योद्धा है। भैरव के 8 स्वरूप पाए जाते है जिनमे प्रमुक्त काला और गोरा भैरव अति प्रसिद्ध है। रूद्र माला से सुषोभित जिनकी आँखों में से आग की लपटे निकलती है जिनके हाथ में कपाल है जो अति उग्र है इसे काल भैरव को वंदन है।

काल के उत्पत्ति की कथा शिव पुराण में इस तरह है कि एक बार मेरु पर्वत के शिखर पर ब्रम्ह्मा विराजमान थे। तब सभी देवगण और ऋषिदेव उत्तम तत्व के बारे में जानने के लिए उनके पास गए। तब ब्रम्हा ने कहा कि वह स्वयं ही उत्तम तत्त्व है यानि सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्य है किन्तु भगवान विष्णु इस बात से सहमत नहीं थे। उन्होंने कहा कि वह इस समस्त सृष्टि के सर्जक और परमपुरष परमात्मा है। तभी उनके बिच एक महान ज्योति प्रकट हुई।

उस ज्योति के मंडल में उन्होंने एक पुरष का एक आकर देखा। तब 3 नेत्र वाले महान पुरष शिव स्वरूप में दिखाई दिए, उनके हाथ में त्रिशूल था, सर्प और चंद्र के अलंकार धारण किये हुए थे। तब ब्रम्हा ने अहंकार से कहा की आप पहले मेरे ही लगाट से रूद्र रूप में प्रकट हुए है।

उनके इस अहंकार को देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और उस क्रोध से भैरव नमक पुरष को उत्पन्न किया। ये भैरव बड़ी तेज़ से प्रज्वल्लित हो उठा और साक्षात् काल की भाति दिखने लगा। इसलिए वो काल राज़ से प्रसिद्ध हुआ और भयंकर होने से भैरव कहलाने लगा।