बचपन में अखबार बांटे, पिता सिलते थे लोगों के कपड़े, आज IAS है गरीब दर्जी का यह बेटा

New Delhi : नीरीश राजपूत के पिता वीरेन्द्र राजपूत एक दर्जी हैं । मध्य प्रदेश के भिंड जिले का एक गरीब लड़के के IAS बनने की कहानी बेहद दिलचस्प है। इन्होंने बेहद कठिन सिविल सेवा परीक्षा में पास होने के लिए सभी मुश्किलों को पार किया और साबित किया कि गरीबी सफलता के लिए बाधा नहीं है।

उन्हें नहीं पता था कि आईएएस अधिकारी कैसे बना जा सकता है लेकिन वे जानते थे कि देश के शीर्ष परीक्षा में सफल होने के बाद हीं वे अपना भाग्य बदल सकते हैं और उन्हें विश्वास था कि यदि कोई दृढ़ संकल्पी हो और कड़ी मेहनत करने को तैयार हो तो उनकी गरीबी उसकी सफलता की राह में बाधा नहीं हो सकती। वे सरकारी स्कूल और फिर ग्वालियर के कॉलेज से पढ़े थे।

नीरीश के पिता कपड़ों की सिलाई का काम करते थे। महज 15 बाय 40 फीट के छोटे से मकान में निरीश अपने 3 भाई-बहिनों और माता-पिता के साथ रहते थे। बचपन से ही पढ़ाई में काफी होशियार थे। निरीश की पढ़ाई सरकारी स्कूल में हुई। पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए निरीश ने अखबार बांटने का काम किया। वे पिता के साथ सिलाई में भी हाथ बंटाते थे। निरीश ने अपनी प्रतिभा के दम पर 10 वीं में 72 प्रतिशत अंक हासिल किए। आगे की पढ़ाई के लिए वे ग्वालियर आ गए जहां उन्होंने सरकारी कॉलेज से बीएससी और एमएससी दोनों में पहला स्थान हासिल किया। यहां वे पढ़ाई के साथ-साथ पार्ट टाइम जॉब करते हुए सिविल सर्विसेज की तैयारी करने लगे।

बकौल निरीश, “मैं नहीं जानता था कि आईएएस अफसर कैसे बना जाता है, लेकिन इतना जानता था कि देश की इस सबसे चुनौतीपूर्ण परीक्षा में सलेक्ट होना मेरी किस्मत बदल देगा।” हालांकि, चुनौतियां कम होने का नाम नहीं ले रही थीं। इस बीच निरीश विश्वासघात का शिकार भी हुए। उनके एक दोस्त ने उत्तराखंड में नया कोचिंग इंस्टीट्यूट खोला और निरीश को यहां पढ़ाने का का ऑफर इस वादे के साथ किया कि इंस्टीट्यूट की अच्छी शुरुआत हो जाने पर वह निरीश को सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए स्टडी मटीरियल उपलब्ध करा देगा।

2 सालों तक नीरीश की कड़ी मेहनत के चलते जब वह इंस्टीट्यूट फेमस हो गया और काफी इनकम होने लगी तो उस दोस्त ने निरीश को नौकरी से निकाल दिया। इसके बाद निरीश दिल्ली चले आए। दिल्ली में अंकित नाम के लड़के से उनकी दोस्ती हो गई, जो खुद भी आईएएस की तैयारी कर रहा था। निरीश उसके साथ रहकर पढ़ाई करने लगे। वे दिनभर में लगभग 18 घंटे पढ़ाई करते थे। निरीश बताते हैं, “मैंने किसी कोचिंग इंस्टीट्यूट का सहारा नहीं लिया, बल्कि अंकित के ही नोट्स और किताबों से तैयारी जारी रखी। और आखिरकार एक IAS अधिकारी बनकर खड़ा हो गया।