नाना पाटेकर 13 की उम्र में सड़कों पर लगाते थे पोस्टर, आज गरीबों के रियल लाइफ हीरों हैं

New Delhi : बॉलीवु़ड के एंग्री मैन, विलेन जैसा हीरो, गरीबों के रियल लाइफ हीरो अपनी एक्टिंग से किसी में भी जोश भर देने वाले नाना पाटेकर को उनके फेन्स ने न जाने ऐसे ही कितने नाम दिए हैं। वैसे उनका असली नाम विश्वनाथ पाटेकर है। जब नाना पाटेकर अपनी शुरूआती फिल्मों में एक्टिंक करते नजर आते थे तो लोग कहते थे कि कोई लड़का एक्टिंग नहीं अपनी रियल लाइफ स्टोरी बयां कर रहा है। उन्होंने बॉलीवुड को एक्टिंग के नए प्रतिमानों से रू-ब-रू कराया। ये कहना गलत नहीं होगा कि उनकी एक्टिंग में जो जोश, जो गुस्सा और जो आक्रोश है दरअसल वो उनके जीवन संघर्षों का ही परिणाम है।

उन्होंने कई बार अपने जीवन संघर्षों को मीडिया में बताते हुए कहा कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उनके जैसे ‘बदसूरत’ आदमी को करोड़ों लोग स्टार मान लेंगे। मैं तो 13 साल की उम्र में सड़कों पर 35 रुपये महीना की पगार पर पोस्टर लगाया करता था, तब एक टाइम के खाने से मेरा पेट भरता था।
जिस समय नाना पाटेकर फिल्मी दुनिया में एंट्री पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब हीरो और एक्टिंग के माने कुछ और थे। नाना पाटेकर खुद बताते हैं कि उन्हें कई बार अपनी शक्ल सूरत और कद-काठी के कारण रिजेक्ट किया गया। तब हीरो की छवि चिकने गोरे चेहरे वाली होती थी। उसे एक्टिंग भी एक ढ़र्रे पर करनी होती थी। लेकिन पहली बार नाना पाटेकर ने बॉलीवुड के इस नजरिए को बिल्कुल बदल गया। आज नवाजुद्दीन सिद्दिकी, मनोज बाजपेयी और पंकज त्रिपाठी जैसे एक्टर्स जिस तरह की एक्टिंग और रोल फिल्मों में कर रहे हैं उसका रास्ता नाना पाटेकर ने ही बनाया था। नाना पाटेकर के स्ट्रगल की बात करें तो ये उनकी लाइफ में 13 साल की उम्र से ही शुरू हो गया था। उनके पिता का टेक्सटाइल का एक छोटा कारोबार था जिसमें उन्हें भारी नुकसान हुआ। इसके चलते उनके पिता को अपनी सारी प्रोपर्टी बेचनी पड़ी। घर के हालात इतने खराब हो गए कि खाने के लिए भी उनके पिता अब चिंतित रहने लग गए।
ऐसे में 13 साल के नाना पाटेकर को अपनी फैमिली को सपोर्ट करने और अपनी पढ़ाई का खर्चा निकालने के लिए खुद काम करना पड़ा। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया- मैं अचानक 13 साल की उम्र में काम करने लगा। स्कूल के बाद मैं 8 किलोमीटर दूर चूना भट्टी में जाता और फिल्मों के पोस्टर्स पेंट करने लगा ताकि एक वक्त की रोटी मिल सके. उस दौरान मुझे 35 रुपए महीने मिलते थे। मैं नौवीं क्लास में था लेकिन उन हालातों में शर्मिंदगी और सफल होने की भूख ने मुझे इतना कुछ सिखा दिया कि मुझे किसी एक्टिंग स्कूल जाने की जरूरत नहीं पड़ी. मुझे अपनी फैमिली को सपोर्ट करना था क्योंकि मेरे पिता ने सब कुछ गंवा दिया था। वे हमेशा कहते थे कि बच्चों के दिन आए खाने के और मेरे पास कुछ नहीं है। वे काफी परेशान रहते थे और जब मैं 28 साल का हुआ तो उनकी हार्ट अटैक से मौत हो गई थी।
नाना पाटेकर बचपन से ही फिल्में देखने का और छोटे मोटे नाटक और स्कूल फंक्शन में एक्टिंग करने का शोक रखते थे। उनके पिता जब उन्हें नाटक में कोई रोल करता देखते तो बहुत खुश होते थे। इससे उन्हें भी हिम्मत मिली और उन्होंने पैसे कमाने के लिए थियेटर करना शुरू कर दिया। नाना के करियर की शुरूआत फिल्‍म ‘गमन’ से हुई थी लेकिन इंडस्‍ट्री में उन्‍हें फिल्‍म ‘परिंदा’ से नोटिस किया गया जिसमें उन्‍होंने खलनायक की भूमिका अदा की थी। इस फिल्‍म में उनके अभिनय के लिए उन्‍हें सर्वश्रेष्‍ठ सहायक अभिनेता का राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार और सर्वश्रेष्‍ठ सहायक अभिनेता का फिल्‍मफेयर पुरस्‍कार भी दिया गया। इसके बाद उन्‍होंने कई अच्‍छी फिल्‍मों में काम किया और अपने अभिनय का लोहा मनवाया। क्रांतिवीर, खामोशी, यशवंत, अब तक छप्‍पन, अपहरण, वेलकम, राजनीति उनकी प्रमुख फिल्‍मों में से एक हैं।
नाना पाटेकर रील लाइफ में ही नहीं रियल लाइफ में भी हीरो हैं। वो गरीब, किसानों, विधवाओं, आपदा पीड़तों की समय समय पर काफी मदद करते रहते हैं। किसानों की मदद करने और उन्हें नई तकनीक से जो़ड़ने के लिए उन्होंने नाम फाउंडेशन के नाम से एक एनजीओ की शुरूआत की। इसमें नाना ने अपनी निजी संपत्ती से बड़े पैमाने पर उन किसानों की मदद की जिनके पास जमीन नहीं थी या जमीन थी तो खेती की उन्नत तकनीक नहीं थी। उन्होंने उन किसानों की विधवाओं की मदद की जिन्होंने सूखा पड़ जाने से फांसी लगाकर अपनी जान दे दी।

बिहार में बाढ़ पीड़ितों की मदद करना हो या फिर सैनिकों के लिए कुछ कर पाना नाना पाटेकर इन नेक कामों में सबसे आगे रहे हैं। उन्होंने अपनी एक्टिंग के साथ ही इन कामों से भी लोगों का दिल जीता है।

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